ईश्वर स्तुति .. Greatness of God
ईश्वर स्तुति .. Greatness of God
1. अक्षर सबके आदि में, है अकार का स्थान ।
अखिल लोक का , रहा आदि आदि तोभगवान ॥
2
विद्योपार्जन भी भला, क्या आयेगा काम ।
श्रीपद पर सत्याज्ञ के, यदि नहिं किया प्रणाम ॥
3
हृदय-पद्म-गत ईश के, पाद-पद्म जो पाय ।
श्रेयस्कर वरलोक में, चिरजीवी रह जाय ॥
4
राग-द्वेष विहीन के, चरणाश्रित जो लोग ।
दुःख न दे उनको कभी, भव-बाधा का रोग ॥
5
जो रहते हैं ईश के, सत्य भजन में लिप्त ।
अज्ञानाश्रित कर्म दो, उनको करें न लिप्त ॥
6
पंचेन्द्रिय-निग्रह किये, प्रभु का किया विधान ।
धर्म-पंथ के पथिक जो, हों चिर आयुष्मान ॥
7
ईश्वर उपमारहित का, नहीं पदाश्रय-युक्त ।
तो निश्चय संभव नहीं, होना चिन्ता-मुक्त ॥
8
धर्म-सिन्धु करुणेश के, शरणागत है धन्य ।
उसे छोड दुख-सिन्धु को, पार न पाये अन्य ॥
9
निष्क्रिय इन्द्रिय सदृश ही, 'सिर' है केवल नाम ।
अष्टगुणी के चरण पर, यदि नहिं किया प्रणाम ॥
10
भव-सागर विस्तार से, पाते हैं निस्तार ।
ईश-शरण बिन जीव तो, कर नहीं पाये पार ॥
1. अक्षर सबके आदि में, है अकार का स्थान ।
अखिल लोक का , रहा आदि आदि तोभगवान ॥
2
विद्योपार्जन भी भला, क्या आयेगा काम ।
श्रीपद पर सत्याज्ञ के, यदि नहिं किया प्रणाम ॥
3
हृदय-पद्म-गत ईश के, पाद-पद्म जो पाय ।
श्रेयस्कर वरलोक में, चिरजीवी रह जाय ॥
4
राग-द्वेष विहीन के, चरणाश्रित जो लोग ।
दुःख न दे उनको कभी, भव-बाधा का रोग ॥
5
जो रहते हैं ईश के, सत्य भजन में लिप्त ।
अज्ञानाश्रित कर्म दो, उनको करें न लिप्त ॥
6
पंचेन्द्रिय-निग्रह किये, प्रभु का किया विधान ।
धर्म-पंथ के पथिक जो, हों चिर आयुष्मान ॥
7
ईश्वर उपमारहित का, नहीं पदाश्रय-युक्त ।
तो निश्चय संभव नहीं, होना चिन्ता-मुक्त ॥
8
धर्म-सिन्धु करुणेश के, शरणागत है धन्य ।
उसे छोड दुख-सिन्धु को, पार न पाये अन्य ॥
9
निष्क्रिय इन्द्रिय सदृश ही, 'सिर' है केवल नाम ।
अष्टगुणी के चरण पर, यदि नहिं किया प्रणाम ॥
10
भव-सागर विस्तार से, पाते हैं निस्तार ।
ईश-शरण बिन जीव तो, कर नहीं पाये पार ॥
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