गणेशस्तवन
गणेशस्तवन
||श्रीराम समर्थ ||
ॐ नमोजि गणनायेका| सर्व सिद्धिफळदायेका |अज्ञानभ्रांतिछेदका| बोधरूपा ||१||
माझिये अंतरीं भरावें| सर्वकाळ वास्तव्य करावें |मज वाग्सुंन्यास वदवावें| कृपाकटाक्षेंकरूनी ||२||
तुझिये कृपेचेनि बळें| वितुळती भ्रांतीचीं पडळें |आणी विश्वभक्षक काळें| दास्यत्व कीजे ||३||
येतां कृपेची निज उडी| विघ्नें कापती बापुडीं |होऊन जाती देशधडी| नाममात्रें ||४||
म्हणौन नामें विघ्नहर| आम्हां अनाथांचे माहेर |आदिकरूनी हरीहर| अमर वंदिती ||५||
वंदूनियां मंगळनिधी| कार्य करितां सर्वसिद्धी |आघात अडथाळे उपाधी| बाधूं सकेना ||६||
जयाचें आठवितां ध्यान| वाटे परम समाधान |नेत्रीं रिघोनियां मन| पांगुळे सर्वांगी ||७||
सगुण रूपाची टेव| माहा लावण्य लाघव |नृत्य करितां सकळ देव| तटस्त होती ||८||
सर्वकाळ मदोन्मत्त| सदा आनंदे डुल्लत |हरूषें निर्भर उद्दित| सुप्रसन्नवदनु ||९||
भव्यरूप वितंड| भीममूर्ति माहा प्रचंड |विस्तीर्ण मस्तकीं उदंड| सिंधूर चर्चिला ||१०||
नाना सुगंध परिमळें| थबथबा गळती गंडस्थळें |तेथें आलीं षट्पदकुळें| झुंकारशब्दें ||११||
मुर्डीव शुंडादंड सरळे| शोभे अभिनव आवाळें |लंबित अधर तिक्षण गळे| क्षणक्ष्णा मंदसत्वी ||१२||
चौदा विद्यांचा गोसांवी| हरस्व लोचन ते हिलावी |लवलवित फडकावी| फडै फडै कर्णथापा ||१३||
रत्नखचित मुगुटीं झळाळ| नाना सुरंग फांकती कीळ |कुंडलें तळपती नीळ| वरी जडिले झमकती ||१४||
दंत शुभ्र सद्दट| रत्नखचित हेमकट्ट |तया तळवटीं पत्रें नीट| तळपती लघु लघु ||१५||
लवथवित मलपे दोंद| वेष्टित कट्ट नागबंद |क्षुद्र घंटिका मंद मंद| वाजती झणत्कारें ||१६||
चतुर्भुज लंबोदर| कासे कासिला पितांबर |फडके दोंदिचा फणीवर| धुधूकार टाकी ||१७||
डोलवी मस्तक जिव्हा लाळी| घालून बैसला वेटाळी |उभारोनि नाभिकमळीं| टकमकां पाहे ||१८||
नाना याति कुशुममाळा| व्याळपरियंत रुळती गळां |रत्नजडित हृदयकमळा- | वरी पदक शोभे ||१९||
शोभे फरश आणी कमळ| अंकुश तिक्षण तेजाळ |येके करीं मोदकगोळ| तयावरी अति प्रीति ||२०||
नट नाट्य कळा कुंसरी| नाना छंदें नृत्य करी |टाळ मृदांग भरोवरी| उपांग हुंकारे ||२१||
स्थिरता नाहीं येक क्षण| चपळविशईं अग्रगण |साजिरी मूर्ति सुलक्षण| लावण्यखाणी ||२२||
रुणझुणा वाजती नेपुरें| वांकी बोभाटती गजरें |घागरियासहित मनोहरें| पाउलें दोनी ||२३||
ईश्वरसभेसी आली शोभा| दिव्यांबरांची फांकली प्रभा |साहित्यविशईं सुल्लभा| अष्टनायका होती ||२४||
ऐसा सर्वांगे सुंदरु| सकळ विद्यांचा आगरु |त्यासी माझा नमस्कारु| साष्टांग भावें ||२५||
ध्यान गणेशाचें वर्णितां| मतिप्रकाश होये भ्रांता |गुणानुवाद श्रवण करितां| वोळे सरस्वती ||२६||
जयासि ब्रह्मादिक वंदिती| तेथें मानव बापुडे किती |असो प्राणी मंदमती| तेहीं गणेश चिंतावा ||२७||
जे मूर्ख अवलक्षण| जे कां हीणाहूनि हीण |तेचि होती दक्ष प्रविण| सर्वविशईं ||२८||
ऐसा जो परम समर्थ| पूर्ण करी मनोरथ |सप्रचीत भजनस्वार्थ| कल्लौ चंडीविनायेकौ ||२९||
ऐसा गणेश मंगळमूर्ती| तो म्यां स्तविला येथामति |वांछ्या धरूनि चित्तीं| परमार्थाची ||३०||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे गणेशस्तवननाम समास दुसरा ||२||१. २
Comments
Post a Comment